"पन्थनिरपेक्ष"


संविधान ( 45वां संशोधन ) विधेयक में यह निर्धारित करने का प्रयास किया गया था कि संविधान के पंथनिरपेक्ष तथा लोकतंत्रात्मक स्वरूप को संविधान की एक बुनियादी विशेषता माना जाएगा .
The Constitution (45th Amendment) Bill sought to lay down that secular and democratic character of the Constitution would be regarded as being among the basic features of the Constitution.
केशवानन्द भारती तथा मिनरवा के मामलों में पंथनिरपेक्षता को एक बुनियादी विशेषता बताया गया .
In the Kesavananda Bharti and Minerva Mills cases, secularism came to be mentioned as a basic feature.
न्यायमूर्ति रामास्वामी के अनुसार लोकतांत्रिकशासन व्यवस्था , संघीय ढांचा , राष्ट्र की एकता और अखंडता , पंथनिरपेक्षता , समाजवाद , सामाजिक न्याय तथा न्यायिक पुनरीक्षणसंविधान के मूल लक्षणों में हैं .
Justice Ramaswamy held that a democratic form of Government, federal structure, unity and integrity of the nation , secularism , socialism , social justice and judicial review were among the basic features of the Constitution .
शाह बानो के मामले में कानून - निर्मातारूढिवादी मुसलमानों के दबाव में आ गए और पंथनिरपेक्षता या सभी के लिए समान न्याय के संवैधानिक संबोध की मूल भावना के नितांत प्रतिकूल मुस्लिम महिला ( विवाह - विच्छेद के अधिकार का संरक्षण ) अधिनियम , 1986 लाया गया ताकि उच्च्तम न्यायालय के निर्णय को रद्द किया जा सके .
In the Shah Banu case , the law - makers yielded to the pressure of fundamentalist Muslim opinion and much against the letter and spirit of the constitutional precepts of secularism or equal justice for all , Muslim Women ( Protection of Right of Divorce ) Act , 1986 was brought in to nullify the Supreme Court judgement .
ए . आर . ब्लेकशीड ने पश्चिम में ' सेक्यूलेरिज्म ' ( पंथनिरपेक्षता ) के अवबोधन तथा उसकी सीमाओं को नियत करने का प्रयास किया , पर वे इस शब्द की किसी ऐसी परिभाषा पर पहुंचने में असमर्थ रहे जो पूरी तरह से सक्षम तथा स्वीकार्य हो .

A . R . Blackshield who tried to fix the perception and parameters of secularism in the West , was unable to arrive at any fully viable and acceptable definition of the term .
यह जरूरी दीख पडता है कि पंथनिरपेक्षता शब्द की स्पष्ट परिभाषा स्वयं संविधान में ही कर दीजाए , विद्यमान कानूनों को दृढता से लागू किया जाए तथा और भी कडा कानून पास किया जाए ताकि कोई दल या व्यक्ति राजनीतिक प्रयोजनों के लिए धर्म का दुरुपयोग न कर सके .
 It seems necessary that the term secularism be clearly defined in the Constitution itself , firmer legislation passed and already existing legislation firmly implemented for preventing misuse of religion for political purposes by any party or person .
अनिवार्य है कि एक पंथनिरपेक्ष राज्य का धार्मिक कार्यों से कोई संबंध न हो , सिवाय उस स्थिति के जब उनके प्रबंध में अपराध , धोखाधडी अंतर्ग्रस्त हो या वह राज्य की एकता तथा अखंडता के लिए खतरा बन जाए .
 Secular State must have nothing to do with religious affairs except when their management involves crime, fraud or becomes a threat to unity and integrity of the State .
इसी प्रकार , राज्य के पंथनिरपेक्ष स्वरूप को भी समाप्त नहीं किया जा सकता ( पैरा 1437 ) .
The secular character of the State could not , likewise , be done away with ( para 1437 ) .
जो भी हो , अब भारतीय संवैधानिक विधि में पंथनिरपेक्ष शब्द का एकमात्र प्रवर्तनीय निर्वचन वही होगा जो संविधान के विभिन्न प्रावधानों जैसे अनुच्छेद 14 , 15 , 16 , 19 और 25 तथा 28 से समझा जा सकता है .

Notwithstanding anything , the only operative interpretation of the term ' secular ' in Indian Constitutional Law now would be what can be gathered from the different provisions of the Constitution e . g . articles 14 , 15 , 16 , 19 , 25 to 28 , 44 etc .
42वें संविधान संशोधन अधिनियम में, जिसके द्वारा पंथनिरपेक्ष शब्द जोडा गया था, इसकी परिभाषा करने का प्रयास नहीं किया गया.
 The Forty - second Constitutional Amendment Act which added the word secular did not attempt to define it,
संविधान में एक ऐसी पंथनिरपेक्ष व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया गया जिसके अंतर्गत बहुसंख्यकों को राज्य की ओर से कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए या उन्हें कोई प्राथमिकता पाने का अधिकार नहीं दिया गया और अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों को अनेक प्रकार से संरक्षण प्रदान किया गया .
 The Constitution sought to establish a ' secular ' order under which the majority of the population did not enjoy any special privileges or preferential treatment at the hands of the State and the ' religious ' rights of the minorities were protected in different ways. This paragraph is bias to promote so called minority.
विभिन्न प्रकार के मामलों को निपटाने के लिए विभिन्न प्रकार के न्यायालय थे , भूमि के अधिकारों से संबंधित विवादों के लिए राजस्व न्यायालय थे , विवाह , उत्तराधिकार , विवाह विच्छेद आदि के मामलों के लिए काजियों के न्यायालय थे , धर्मेत्तर और अपरिभाषित अपराधों के विचारण के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की अध्यक्षता वाले पंथनिरपेक्षन्यायालय थे और न्यायिक संगठन के बाहर जाति न्यायालय तथा ग्राम पंचायतें थीं .

There were various types of courts dealing with various kinds of cases ; revenue courts settling cases arising out of complaints about rights in land ; the Qazi ' s courts dealing with cases pertaining to marriage , inheritance , divorce , etc ; the secular courts headed by administrative officers dealing with non - religious and undefined offences that came before them and the caste courts and village Panchayats outside the judicial organisation .

धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता में अंतर
26 नवंबर,1949 को भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ था। उसी दिन की याद में ‘संविधान दिवस’ मनाते हुए दो दिन से सदन में संविधान पर चर्चा हो रही थी। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को चर्चा की शरुआत करते हुए कहा कि देश में ‘सेक्युलर’ शब्द का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग हुआ है और इसे बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंग्रेज़ी के शब्द सेक्युलर का वास्तविक अर्थ पंथ निरपेक्ष होता है न कि धर्म निरपेक्ष। दरअसल उन्होंने इस चर्चा के बहाने विपक्ष पर इस बात के लिए एकदम सही और सटीक निशाना साधा कि उसने भारत की राजनीति में अपने फायदे के लिए इस शब्द का बहुत ज्यादा दुरुपयोग किया है। इस वार से कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष का तिलमिलाना स्वाभाविक था, क्योंकि पूरा देश ये जानता है कि विपक्ष की पूरी राजनीति ‘सेकुलरिज्म’ पर ही  की हुई है। ‘सेकुलरिज्म’ वाली राजनीति आज से नहीं 1966 के दौर से जारी है।

यही वजह थी कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयान पर नाराजगी जताते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि संविधान खतरे में है। कांग्रेस के कुछ सांसदों ने तो गृहमंत्री के बयान को असंवैधानिक और देश में असहिष्णुता फैलाने वाला बताते हुए उनकी बर्खास्तगी तक की मांग कर डाली। आइये अब धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता क्या है, इस मुद्दे पर पहले विचार करें, ताकि हमें यह पता चले कि भाजपा सही है या विपक्ष? भारतीय संविधान में बयालीसवाँ संशोधन, जो सन 1976 में हुआ, उसमे संसद को सर्वोच्चता प्रदान की गई और मौलिक अधिकारों पर निर्देशक सिद्धांतों को प्रधानता दी गई। इसमें 10 मौलिक कर्तव्यों को भी जोड़ा गया। नये शब्द– ‘समाजवादी (सोशलिस्ट), धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) और राष्ट्र की एकता और अखंडता’ को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया।


भारत में पंथनिरपेक्षता इससे पहले नहीं थी, ऐसा नहीं, किन्तु संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द के रूप में इसका उल्लेख नहीं था। आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि संविधान सभा ने लंबी बहस के वावजूद भी मूल संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द को जगह नहीं दी थी। क्या उन्हें भय था कि यह शब्द भविष्य में दुबारा भारत के विभाजन का कारण बन सकता है? बिलकुल सही बात है। देश के कुछ महान नेताओं के विचार पढ़ें तो सत्यता का अहसास हो जाएगा। यदि आप मोहनदास करम चन्द्र गांधी (गांधी जी की जीवनी.. धनंजय कौर), सरदार वल्लभ भाई पटेल (संविधान सभा में दिए गए उनके भाषण) और बाबा साहब भीम राव अंबेडकर (डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय, खण्ड १५१) के इस्लाम पर व्यक्त किये गए विचार पढ़ लें तो आपको पता चल जाएगा कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को संविधान में वो क्यों रखने के पक्ष में नहीं थे और इस शब्द को वो कितना घातक समझते थे? अंग्रेजी शब्दकोश में ‘सेकुलरिज्म’ का अर्थ बताया गया है कि वो संवैधानिक सिद्धांत या नियम, जिसके आधार पर सरकार और उसके कर्मचारी सभी धर्मों के प्रति समान और सम्मान का भाव रखते हैं तथा धर्म और धर्मगुरुओ से दूरी बनाये रखते हैं, ‘सेकुलरिज्म’ कहलाता है।

भारत में यह एक विडंबना और पाखंड ही है कि सभी पार्टिया धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगती हैं और अपने को सेकुलर भी कहती हैं। पंथनिरपेक्षता की बात करें तो पहले पूरा यूरोप ही तथाकथित पावन ईसाई साम्राज्य के अधीन था। उस समय यूरोप में ईसा को पैगंबर, बाईबिल को धर्मपुस्तक और पोप को ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि मानना अनिवार्य था। ऐसा नहीं करने पर जान से मार दिया जाता था। ये वो समय था, जब यूरोप के राज्यों में जब एक पंथ को मानने वाला राजा हो जाता था तो वह अन्य पंथों के खिलाफ साजिश रचता था और आजीवन उन्हें नष्ट करने की कोशिश करता था। पूरे यूरोप में 13वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक करोड़ों स्त्री पुरुष और बच्चे इसी साजिश और धर्मभेद के कारण मार डाले गए और यहाँ तक कि बहुत से तो ज़िंदा ही जला दिए गए। यूरोप में सन् 1648 में वेस्टफेलिया की संधि से ‘सेक्युलरिज्म’ या धर्मनिरपेक्षता की शुरुआत हुई, जिसमे यह तय हुआ कि शासक अपने राज्य में अन्य मतावलंबियों को जान से नहीं मारेगा और उन पर मत परिवर्तन के लिए दबाव भी नहीं डालेगा।

यहीं से यूरोप में दूसरे पंथों को सहन करने की शरुआत हुई, किन्तु यह भी सत्य है कि इस ‘सेक्युलरिज्म’ में विभिन्न पंथों के बीच एक दूसरे के लिए आदर-सम्मान का भाव कभी नहीं रहा, सिर्फ राजा और चर्च की धार्मिक सत्ता को एक दूसरे से अलग कर दिया गया। विदेशों में पंथनिरपेक्षता की शुरुआत सन 1776 में पहली बार तब हुई, जब स्वतंत्र अमेरिका की घोषणा होने के बाद वहां के धार्मिक मतमतांतर (पंथ भिन्नता) को देखते हुए लिखित संविधान के साथ प्रथम पंथनिरपेक्ष राज्य, संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रादुर्भाव की घोषणा की गई। यदि हम दिव्य और आध्यात्मिक भारत भूमि की बात करें तो सनातन काल से जो पंथनिरपेक्षता उसके खून में है, वह विश्व में कहीं नहीं है। हमने तो आज से 5000 साल से भी अधिक पहले यह घोषणा कर दी थी कि दुनिया के सभी लोग सुखी हों, सभी लोग रोगमुक्त रहें और सभी लोग मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी व्यक्ति को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
सनातन धर्म में सभी प्राणियो के कल्याण की और एक परमतत्व को देखने की जो ‘वसुधैव कुटुबकंम’ वाली सद्भावना व्यक्त की गई है, उसी की प्रेरणा से ही कालांतर में मानव-धर्म, मानवाधिकार, पंथनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता आदि आधुनिक मत का उदभव हुआ है।
 यदि आज के भारत की बात करें तो यहाँ पर एक समान नागरिक संहिता लागू नहीं होने के कारण ही ‘सेकुलरिस्म’ यानि धरनिरपेक्षता विवादित और बदनाम हुई है। हमारे देश में पहले कभी ऐसा भी समय था, जब सभी धर्मों के प्रति एक समान आदर-सम्मान का भाव रखने वाले नेता और बुद्धिजीवी सेकुलर कहलाते थे। कुछ समय बाद मुसलमानों के पक्ष में बोलने वाले तथा गलत बात में भी उनका बचाव और उनकी तरफदारी करने वाले सेकुलर कहलाने लगे। सबको मालूम है कि हमारे देश पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऑन रिकोर्ड ये कहा था कि देश की संपत्ति और संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। आश्चर्य की बात है कि देश के बुद्धिजीवियों ने उस समय उनके इस विवादित बयान पर कोई पुरस्कार, सम्मान वापसी या असहिष्णुता बढ़ने का हो हल्ला नहीं किया। अब तो स्थिति ये है कि हिंदू धर्म से नफरत करने वाले, हिंदू होकर भी हिंदू धर्म की बुराई करने वाले और हिन्दू धर्म को कमजोर करने वाले सबसे बड़े सेकुलर नेता या बुद्धिजीवी हैं। यही वजह है की आज देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने और धर्मनिरपेक्षता की जगह पंथनिेपेक्षता अपनाने की बात हो रही है।

धर्म’ शब्द का विशद ज्ञान रखने वाले विद्वानों की हमेशा से ही यह राय रही है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का प्रयोग गलत है। काफी समय पहले महादेवी वर्मा ने हमारे देश के नेताओं से पूछा था, “हम अपने धर्म के प्रति निरपेक्ष कैसे हो सकते हैं?” उन्हें किसी नेता ने कोई जबाब नहीं दिया, क्योंकि जबाब उनके पास है ही नहीं। उनमे से अधिकतर को तो इतना भी पता नहीं होगा कि अंग्रेजी शब्द ‘रिलीजन’ का अर्थ मत, पंथ या संप्रदाय है, धर्म नहीं। धर्म का उपासना पद्धति से नहीं, बल्कि आचरण से संबंध है। मनुस्मृति का यह श्लोक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत है-

धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थात- मनु ने धृति (धैर्य), क्षमा, दम, अस्तेय, शौच (पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह, ज्ञान, विद्या, सत्य, क्रोध का त्याग ये धर्म के या धार्मिक होने के दस लक्षण हैं।

पंथनिरपेक्षता की यदि हम बात करें तो यह धर्मनिरपेक्षता से कहीं अधिक उपयुक्त शब्द है। आज दुनिया के अधिकतर आधुनिक देशों में इसी शब्द का उपयोग हो रहा है। यह किसी राष्ट्र में रहने वाले विभिन्न पंथों से सरकार की तटस्थता या समरूपता को दर्शाता है। जबकि धर्मनिरपेक्षता धर्म यानि ईश्वर से मनुष्य को विमुख होने का गलत सन्देश देती है। यदि आप मानव-धर्म या संविधान को ही सर्वोच्च धर्म मानते हैं तो भी यह उससे निरपेक्ष या विमुख होने का गलत सन्देश देती है। संविधान दिवस पर लोकसभा में चर्चा के दौरान अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “देश का एक ही धर्म संविधान है।” मुझे लगता है कि धर्म शब्द को लेकर मोदी जी भी दुविधा में हैं। संविधान का पालन करना बेशक हम सब का सबसे बड़ा कर्तव्य है। किन्तु यह धर्म नहीं है, सृष्टि का एकमात्र धर्म परमात्मा है। संसार के सभी धर्मगुरुओं को चाहिए कि वो ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करने के साथ साथ सभी धर्मों की जानकारी भी रखें, तभी देश और दुनिया में सर्वधर्म समभाव संभव है।

महादेवी वर्मा ने बहुत कम शब्दों में यह भाव प्रकट करते हुए कहा था, “हम अपने धर्म के प्रति निरपेक्ष कैसे हो सकते हैं।” ‘रिलीजन का पर्याय मत, पंथ या संप्रदाय है। धर्म नहीं। धर्म का उपासना पद्धति से कोई संबंध नहीं है। एक प्रचलित श्लोक है- ‘‘धृति क्षमादमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणं।।’’ यही धर्म की परिभाषा है। इसमें पूजा पद्धति कहीं नहीं है। जो दस बातें गिनाई गई हैं, उन सबका संबंधा मनुष्य के आचरण से है।

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