मजदूर –और भारत के महान पत्रकार सन २०२०
जब से कोरोना काल शुरू हुआ है तब से मजदूरो का पलायन एक देशव्यापी समस्या बन गई हैl एक पत्रकार महोदय इस पलायन से इतने द्रवित हुए की वो घर निकल कर अपना कैमरा लेकर सड़क पर उतर गए और उनके वीडियो शूट करके सोशल मीडिया पर डालने लगे l देखा जाए तो इसमें बिलकुल कुछ गलत नहीं था ये एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया थी l

अब समस्या कहा से उत्त्पन्न होती है की जब उन्होंने इसे एक सवाल के रूप में उठाना शुरू कर दिया तब कोई दिक्कत की बात नहीं थी l परन्तु जब एक पढ़ा लिखा व्यक्ति कोई सवाल, किसी व्यक्ति से या संस्था से पूछता है तो इतनी समझ की आवश्यकता पड़ती है की वो सवाल सही संस्था से पूछे, ये नहीं की, जिम्मेदारी किसी एक्स व्यक्ति की है और सवाल किसी वाई व्यक्ति से पूछा जाएl इस प्रकार सवाल पूछने वाली की मंशा पर ही शक गहरा जाता है की सवाल खड़ा करने वाले पत्रकार की मंशा साफ़ नहीं है और न ही उसकी नियत ठीक है l बल्कि वो किसी की परेशानी, दुःख दर्द को अपने कैरियर को चमकाने के लिए उपयोग कर रहे है l

भारत का दुर्भाग्य यही है की यहाँ का चौथा खम्भा अपनी जिम्मेदारियों से भागता नजर आता है इसका कारण है की मीडिया के छदम मालिक कोई और है l यही कारण है की विश्व पटल पर भारत की मीडिया की कोई भूमिका नहीं है और ना ही अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भारत की मीडिया को गंभीरता से लेता हैl जिन पत्रकार महोदय का ऊपर जिक्र किया गया है उनके चाहने वालो ने उनका एक यू ट्यूब चेनल भी बनवा दिया और उनके फैन और लॉबी ने उनको चने के झाड पर चढ़ा दिया की उनकी रिपोर्टिंग एकदम क्लासिक है और बेचारे लॉबी के झांसे में आकर इसी काम में लग गए जबकि उनके इस काम से उनकी रिपोर्टिंग के केंद्रबिंदु विषय का कोई फायदा नहीं हुआ l
इसी प्रकार एक अन्य पत्रकार महोदय जो फिल्मकार, पत्रकार आदि है उन्होंने और भी कमाल किया उन बेचारों ने करीब १२०० किमी का सड़क से रास्ता ही नाप डाला अन्य प्रवासी मजदूरी के साथ l मेरा उनसे एक सवाल है की बजाय उन मजदूरो के लिए व्यवस्था करने के या फिर जिम्मेदार संस्था से कोई प्रभावी सवाल पूछने के, वो खुद ही साइकल से उनके साथ ही यात्रा पर निकल लिए l अब सवाल उठता है की इस सबसे पत्रकारिता को , समाज को , देश को , उन गरीब मजदूरो को क्या फायदा हुआ, सिवाय एक फायदे की लॉबी ने उनके यात्रा वृतांत को एक महान पत्रकारिता बताते हुए मील का पत्थर करार दे दिया l

अन्य पत्रकार महोदय की लगभग ऐसी ही कहानी है वो तो अपनी गाडी से ही कोरोना काल यात्रा वृतांत बनाने निकल पड़े उनका भी मुख्य काम था अपने यात्रा वृतांत को सोशल मीडिया पर डालना और सहानुभूति कमाना, सवाल पूछना था राज्य से और पूछा केंद्र से बाकी की कहानी ट्विटरलेंड पर अब इतिहास का भाग है की कैसे पत्रकार अजेंडा बनाने में लॉबी द्वारा प्रायोजित अफवाहों को मजबूत करने ऐसे बेचारे और लगभग पैदल पत्रकारों का उपयोग करते है l

स्वयं द्वारा प्रमाणित पत्रकार महोदय ने सत्य शब्द लगाकर एक न्यूज़ पोर्टल बनाया और उस पर लगातार सवाल पूछते रहते है जिनका ना कोई आधार होता है ना कोई प्रमाण , बस सवाल पूछो और निकल लो l उन्हें बेचारों को ये नहीं पता की वो लॉबी के हाथो का खिलौना है बस इससे आगे कुछ नहीं l जनता अब चुटिया नहीं रही है वो पब्लिक है सब जानती है l

दिनांक १३ मई २०२० को मोदी सरकार ने २० लाख करोड़ का राहत पैकेज घोषित किया l जिसका गंभीरता से विश्लेषण करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि ये जमा खर्च के अलावा कुछ नहीं है l
इसमें किसानो के लिए खासतौर पर उन स्थानों पर जहा पर सूखा आदि की वजह से किसानो को हानि हुई है उनके लिए कोई राहत नहीं हैl उनके कृषि ऋण माफ़ किये जा सकते थे और उनको अगली फसल के लिए नकद सहायता दी जा सकती थीl [ वर्तमान में ६००० रूपये की सहायता] और किसानो के लिए उनकी फसल गारंटी खरीद की व्यवस्था की जा सकती थी l परन्तु ऐसा  कुछ नहीं हुआ l किसानो के बच्चो की पढाई की व्यवस्था सरकार कर सकती थी जिससे किसान अपने बच्चो की पढाई की चिंता से मुक्त रह सकते थे l किसान फसल बीमा योजना तो एक सफ़ेद हाथी बनकर रह गयी है l
मजदूर के लिए इसमें क्या था खासकर उन मजदूरो के लिए जिनको उनके नियोजक ने दो महीने से वेतन नहीं दिया है या उन मजदूरो के लिए जो इस समय में सिर्फ प्रवासी बनकर रह गए है l
बाकी घोषणा तो उद्योग जगत के लिए राहत बनकर रह गयी है---एक समस्या आती है की क्या सरकार के पास किसानो और मजदूरो का प्रमाणिक डेटा है ?  

मीडिया जगत में किसी ने भी इस समस्या के मूल में जाने की कोशिश ही नहीं की बल्कि केंद्र सरकार पर इसका ठीकरा फोड़ने में लगे रहे स्वयंभू बुद्धिजीवी भी इस कार्य में बराबर योगदान देते रहे l जबकि केंद्र सरकार का ये फैसला ठीक था l परंतु सभी इस फैसले में असंतुष्ट नजर आये और इसका विरोध करते रहे यहाँ तक की राज्य सरकारों ने इसे विफल करने में बराबर योगदान दिया l महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और गुजरात राज्यों की सरकारों ने इसमें महती योगदान दिया l

अब एक सवाल खड़ा होता है की क्या देश के नेता नेतृत्व करने योग्य है, तो इसका जवाब मिलेगा “नहीं” क्योकि वो तो बेचारे येन केन प्रकारेण अपनी कुर्सी बचाने में लगे रहे l वैसे भी हिन्दुस्तान में राजनीति कोई विषय ही नहीं है l यहाँ पर सत्ता के बस जाति, धर्म, गरीबी, जैसे शब्द बेचने आने चाहये l

कुल मिलकर राज्य सरकारे आपदा जैसे विषय को प्रबंधन करने में असफल रही है l अंत में एक शेर जैसे कागजी शेर साबित होता है उसका उदाहरण महाराष्ट्र में देखा जा सकता है और कुटिल मति का उदाहरण दिल्ली में उपलब्ध है l  

YOGI TYAGI-25-05-2020












Comments

Popular posts from this blog